योगी की शादी ==========


"अनुजा ! आखिर कब हाँ कहोगी तुम शादी के लिए ? मेरी माँ के ताने कभी सुनों तो पता चले तुम्हें!" अनुजा का फोन आते रवि भड़क उठा .

"रवि ! मैं तुम्हारा गुस्सा समझ सकती हूँ . सात साल हो गए मेरा इंतज़ार करते . दाढ़ी के बाल भी सफेदी दिखाने लगे हैं मगर मेरी ये जिम्मेदारियां मुझे इजाजत नहीं देतीं . माँ की बीमारी , छोटी की शादी और भाई की नौकरी के बिना संभव नहीं है ."

"अनुजा ! मैं तो इसे समझता हूँ पर माँ को क्या समझाऊं ? उसने कल योगी होने का ताना भी दे दिया . बहुत टेंशन में हूँ आजकल . तुम्हारे बिना किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकता पर अपने ही दुश्मन हो रहे हैं मेरे . छोटे की शादी का भी दबाब है ."

"हम्म्म . ऐसा करो तुम छोटे की शादी के लिए हाँ कह दो . मैं तो हूँ ही यहाँ आपके लिए इंतज़ार में ."

"माँ कहती है बुढापे में शादी करेगा क्या ? बाबू जी ढाल भी अब कमजोर होने लगी है , वे भी माँ के पाले में कूद जाते हैं और मुझपर दबाब डालते हैं ."

"ठीक है , आज शाम मैं घर आती हूँ तुम्हारे ." अनुजा बोली .

"मगर उस से क्या होगा ?"

"मुझे ही बात करनी है . तभी कुछ हल निकलेगा . मैं छोटी की तस्वीर भी ला रही हूँ ." अनुजा ने फोन कट कर दिया था .

माँ आज पकवान बना रही थीं . घर को भी खूब साफ़ कर दिया था . माँ ने फोन कर बताया कि नरेश की शादी का रिश्ता लेकर कुछ लोग आ रहे हैं . रवि समय से पहुँच गया था घर . उसका दिल जोर-जोर से धकधक कर रहा था कि आज अनुजा भी आएगी और घर में भाई का रिश्ता भी , पक्का बबाल होगा आज .

कुछ देर बाद अनुजा , अपनी माँ, भाई और बहिन के साथ पहुँच गई. सब लोग स्वागत में जुट गए . रवि को भी माँ ने पुकार लिया . रवि हैरान था कि छोटी बहिन का रिश्ता अनुजा ही लेकर आई है .

"बेटी ! आजकल ऐसी बहिन कहाँ मिलती है जो परिवार के लिए बलिदान करती हैं . तुम अपनी बहिन के लिए अपनी शादी न कर के जो त्याग कर रही हो वह तो पूजा के लायक है . पर एक बात बताओ क्या तुम्हारे लिए कोई रिश्ता नहीं आया कभी ?" माँ ने पूछा .

"एक योगी सात साल से इंतज़ार कर रहा है मेरा." अनुजा हंसते हुए बोली ."

"योगी क्यों ?"

"उसकी माँ उसे इसी नाम से ताना देती है मगर वह इस बात को नहीं जानती कि उनका बेटा भी इस तपस्या में मेरे साथ है . बहुत ही अच्छे इंसान हैं वो . जैसे ही मेरी बहिन की शादी हो जायेगी मैं भी शादी कर लूंगी पर अपनी माँ को नहीं छोडूंगी ." अनुजा बोली .

पिता जी मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे और रवि के चेहरे को पढ़ रहे थे .

"सुनो ! रवि की माँ . आज दो रिश्ते तय करने हैं . दो नारियल और साड़ियाँ लाकर दोनों की गोद में रखो . मैं भी देखता हूँ इस योगी को . गधा कहीं का ...डरपोक ." पिता जी हंसते हुए बोले .

"अरे! रवि तो किसी और से प्रेम करता है जी ." माँ बोली .

"वो तपस्विनी यही है . मुझे दोनों बहु पसंद हैं . रहा इसके भाई की नौकरी का सवाल तो अब वो मेरे जिम्मे . क्या पता अपना तपस्वी संन्यास न ले ले ...हा हा हा ." पिता जी ने उठते हुए दोनों के सिर पर हाथ रख दिया .

आज की शाम ऐसे उजाला लाएगी कभी सोचा न था किसी ने . घर ठहाकों से गूँज उठा था . सब एक दूसरे से मिलकर आज एक परिवार बन गए थे . रवि अनुजा की हिम्मत की तारीफ करने से रोक न सका खुद को .

"महापुरुष जी ...आज योगिपना ख़त्म ...हा हा हा ." धीरे से कह अनुजा ने लजाते हुए शर्म से सिर झुका लिया .

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